काव्यशास्त्र विनोदेन :
फुर्सत में गढ़ता है व्यक्ति अपना उत्थान या अवनति
Author: डॉ. निरंजना जोशी
Issue: MAR-APR 2026
फुर्सत का समय केवल विश्राम का अवसर नहीं, बल्कि हमारे चरित्र और दिशा को गढ़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण घड़ी है।
A man is valued by how he uses his leisure time.
संस्कृत भाषा में एक सुभाषित है-
काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा।।
बुद्धिमान अपना समय काव्यशास्त्र में से प्राप्त मनोरंजन में व्यतीत करता है। खाली समय का सदुपयोग या दुरुपयोग इंसान की बुद्धि का प्रमाण होता है- यह बात इस सुभाषित में कही गई है। क्षण का दुरुपयोग करने वाला दुर्जन और सदुपयोग करने वाला सज्जन। किन्तु महाजन तो वही जो समय को विस्तृत करें। जीवन में वर्ष भरना सामान्य जन का काम है और वर्षों में जीवन भरना महाजन का काम।
काव्य हृदय को स्पर्श करता है तो शास्त्र मस्तक को चमकाता है। व्यक्ति काव्यशास्त्र के स्पर्श से रसपूर्ण बन सकता है। इंसान को सर्वांग सुंदर बनने के लिए काव्यशास्त्र का संपर्क रखना चाहिए। साहित्य साधना मानव के भावी-जीवन को समृद्ध एवं गौरवपूर्ण बनाती है।
शास्त्र अर्थात् ‘ज्ञान का प्रकाश।’ शास्त्र के श्रवण-पठन से जीवन की जटिल समस्याएं सहजता से सुलझ जाती हैं। काव्य की ममता और शास्त्र की समता, काव्य के भाव एवं शास्त्र की समझदारी इंसान के जीवन को प्रसन्न बनाती है। ऐसे इंसान का जीवन तनाव मुक्त होता है। उसे जीवन बोझ स्वरूप नहीं लगता।
दूसरी ओर अपना जीवन व्यसन, निद्रा और कलह में बिताने वाला सुभाषितकार की दृष्टि से मूर्ख है। व्यसन सिर्फ सिगरेट शराब जुआ ही नहीं होता, आवश्यकता से अधिक किसी भी चीज का सेवन व्यसन ही है। अपने पास अनेक वस्त्राभूषण होते हुए भी 'सेल' का आकर्षण टाला नहीं जाता, तो वह व्यसन ही है। नींद भी आवश्यक है किंतु इंसान जीवन विकास के बारे में अगर जागृत ना हो तो वह मूर्ख कहलाता है। जागते हुए भी सोए हुए इंसान को कैसे समझाया जा सकता है?
संस्कार संस्कृति या नैतिक जीवन के क्षेत्र में गैरजिम्मेदार व्यक्ति मूर्ख ही कहलाता है। भौतिक समृद्धि में मग्न होते हुए भी कोई मानसिक अस्वस्थ और अशांत हो सकता है। काव्यशास्त्र से अस्पृश्य रहने वाला भाव शून्य और विवेकहीन होने के कारण कलह उसके जीवन का स्थायी भाव बन जाता है। भाव के अभाव के कारण वह समाज में किसी के साथ घुल-मिल नहीं पाता।
किसी कवि ने कहा है- देह मिला है यह तुझको, क्षुद्र कभी तुम ना मानो
देह चाहे क्षणभंगुर हो किंतु आत्मा शाश्वत है इसीलिए आत्मा का अस्तित्व ध्यान में नहीं आता। देह को निरामय सुंदर स्वस्थ रखने के लिए जितनी जागृति रखी जाती है, इतनी अगर आत्मा के बारे में भी रखी जाए तो वह भी प्रसन्न रह सकता है आत्मा को प्रसन्न रखने के लिए उसे मनपसंद आहार देना जरूरी है, वरना बाल श्वेत होने से पहले आत्मा श्वेत हो जाती है। हताशा-निराशा आदि आत्मा के श्वेत होने के लक्षण हैं ।
आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम्।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।।
आहार, निद्रा, भय और मैथुन — ये सब पशुओं और मनुष्यों में समान रूप से पाए जाते हैं। मनुष्यों में जो विशेष तत्व है, वह धर्म है; धर्म से हीन मनुष्य पशुओं के समान हो जाता है।
मानुषात् न परो धर्म:। मानवता से उच्च कोई धर्म नहीं, इंसानियत से बड़ी कोई प्रार्थना नहीं, जगत में जन्म लेने वाले अनन्त प्राणियों से मानव को अलग सिद्ध करने वाला अगर कोई तत्व है तो वह ‘धर्म’ है।
श्रूयताम् धर्मसर्वस्वं,
श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।
आत्मन: प्रतिकूलानि
परेषां न समाचरेत्।।
धर्म का सर्वस्व सुनकर उसका चित्त में मनन करने से जो-जो बातें अपने लिए प्रतिकूल लगती हों, वह आचरण अन्यों के साथ नहीं करना चाहिए। जैसे- कठोर वाणी आदि।
पाँच ‘व' कार इंसान को गौरवशाली बनाते हैं – विचार, वाणी, व्यवहार, वृत्ति एवं विकार।