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मानवता के शाश्वत आदर्श: वाल्मीकि के राम

Author: डॉ. निधि वेदरत्न

Issue: MAR-APR 2026

रामनवमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का उत्सव है। यह वह पावन क्षण है जब मर्यादा, करुणा और धर्म का प्रकाश मानव जीवन को आलोकित करता है। भगवान राम के जन्मोत्सव का यह दिन हमें स्मरण कराता है कि आदर्श केवल कथाओं में नहीं, बल्कि हमारे आचरण में जीवित रहने चाहिए। इसी भाव के साथ प्रस्तुत है हमारी पत्रिका का यह द्वितीय अंक, जो राम के आदर्शों से प्रेरित जीवन मूल्यों की यात्रा पर आपको सहयात्री बना कर इस लेख के माध्यम से अपनी यात्रा आरम्भ करता है। जब भी संसार में मूल्य, मर्यादा और सत्य की चर्चा होती है, एक नाम स्वतः स्मरण हो उठता है — भगवान श्रीराम। रामनवमी का यह पावन अवसर हमें केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपे आदर्शों को जागृत करने का संदेश देता है। इसी शुभ अवसर पर हम अपने प्रथम लेख के माध्यम से श्रीराम के जीवन और उनके सार्वकालिक संदेश को आपके समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं। भारतीय संस्कृति और साहित्य की अमूल्य धरोहरों में वाल्मीकीय रामायण का स्थान अत्यन्त आदरणीय है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा विरचित महाकाव्य रामायण, संसार में आदिकाव्य के रूप में विख्यात है तथा महर्षि वाल्मीकि आदिकवि के रूप में सम्मान प्राप्त है। इस काव्य की रचना महर्षि वाल्मीकि ने भगवान् श्रीराम के राज्य प्राप्त करने के पश्चात् की। जैसा कि इस श्लोक में वर्णन है– प्राप्तराज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवान् ऋषिः। चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत्॥ अर्थात् राज्य प्राप्त कर सिंहासन पर बैठने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का विचित्र पद अर्थों वाला सम्पूर्ण चरित, वाल्मीकि ऋषि ने वर्णन किया। यह काव्य मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्र के जीवन–वृतान्त पर विस्तार से प्रकाश डालता है, इसके अध्ययन से सामान्य मनुष्य जन न केवल भगवान् श्रीराम के लौकिक स्वरूप से परिचित होते हैं अपितु भगवान् श्रीराम ने अनेक विपरीत परिस्थियों में शास्त्रसम्मत मार्ग अपनाते हुए किस प्रकार व्यवहार किया? इनका अनुसरण कर उन्हीं आदर्श जीवन मूल्यों, धर्म, नीति, और विज्ञान से सीख लेते हुए स्वयं व्यवहार करने में भी समर्थ होते हैं। जैसा श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं – यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ 3.21 जो कुछ भी श्रेष्ठ पुरुष आचरण करते हैं, सामान्य जन स्वाभाविक रूप से उसी का अनुसरण करते हैं - यही सनातन दृष्टि का मूल सिद्धान्त है। भगवान श्रीराम का जीवन इसी आदर्श का सर्वोत्तम उदाहरण है, जो गुण, मर्यादा और धर्म की अनुपम खान है। महर्षि वाल्मीकि ने उनके व्यक्तित्व में समाहित बहुमूल्य 72 गुणों का वर्णन करते हुए बताया कि ऐसे अनेक गुण एक ही मनुष्य में मिलना अत्यन्त दुर्लभ हैं “बहवो दुर्लभाश्चैव ते त्वया कीर्तिता गुणाः। मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्युक्तं श्रूयतां नरः॥” बालकाण्ड 1.07 अर्थात् जिन गुणों की चर्चा की गई है, उनमें से अनेक का एक ही व्यक्ति में होना अत्यन्त विरल है। श्रीराम के जीवन में सत्य, करुणा, धैर्य, त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और लोकमंगल की भावना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है, जो मानवता के लिए शाश्वत प्रेरणा का स्रोत है। उनके चरित्र से यह स्पष्ट होता है कि आदर्श केवल उपदेश नहीं, बल्कि आचरण से स्थापित होते हैं, और यही कारण है कि उनका जीवन युगों-युगों से लोकजीवन का मार्गदर्शक बना हुआ है।