मङ्गलाशंसन
Author: प्रो. (डॉ.) चन्द्रकान्ता राय
Issue: Jan-Feb 2026
अग्निमीडे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।
होतारं रत्नधातमम् ॥ (ऋग्वेद 1.1.1)
अन्वय- यज्ञस्य पुरोहितं देवं होतारम् ऋत्विजं रत्नधातमम अग्निम् ईडे।
अनुवाद - यज्ञ के पूर्व भाग में अवस्थित (पुर: हितम्) अथवा यज्ञ के पुरोहित, देवस्वरूप ( दानादि गुणयुक्त), होता (देवताओं का आह्वान करने वाले) ऋत्विक् स्वरूप, (यज्ञकर्ताओं के लिये) नाना प्रकार के धन–धान्य रत्नादि को अतिशय रूप में धारण करने वाले अग्नि की मैं स्तुति करता हूँ।
विशेष- प्रस्तुत मन्त्र ऋग्वेद का प्रथम मन्त्र है जिसका प्रत्यक्ष अपनी आर्ष दृष्टि से मधुच्छन्दा ऋषि ने गायत्री छन्द में किया है। मन्त्र के देवता अग्नि हैं। अग्नि वेद के प्रमुख देवताओं में से एक हैं जिनका भूलोक और देवलोक से घनिष्ठ सम्बन्ध है। अग्नि यज्ञ में अग्रस्थान में स्थापित होते हैं, इसलिये 'पुरोहित' हैं। मनुष्य के द्वारा प्रदत्त हव्य को देवताओं तक पहुँचाने वाले और यज्ञ करने वालों के अभीष्ट को पूर्ण करने वाले देवता हैं।
यज्ञ की प्रक्रिया में भाग लेने वाले प्रत्येक संहिता के कर्मकाण्ड - विशेषज्ञ की सामान्य संज्ञा 'ऋत्विक्' है। इसके अतिरिक्त ऋग्वेद के ऋत्विक् को 'होता' ( देवताओं को यज्ञ में बुलाने वाला), यजुर्वेद के ऋत्विक् को 'अध्वर्यु' (अध्वर=यज्ञ के कर्म को सम्पादित करने वाला), सामवेद के ऋत्विक् को 'उद्गाता' (साममन्त्रों को गेय रूप में प्रस्तुत कर देवताओं का प्रसन्न करने वाला) और अथर्ववेद के ऋत्विक् को 'ब्रह्मा' (यज्ञ की सम्पूर्ण विधि= प्रक्रिया का ज्ञाता) नाम से अभिहित किया गया है।
यज्ञ के लिये यजमान के संकल्प के साथ अग्नि के प्रज्वलित होते ही देवगण अपने हव्यभाग के लिये आकर्षित होते हैं। दूसरे प्रकार से, यज्ञ में प्रज्वलित होते ही अग्नि देव हव्य के अधिकारी देवताओं का यज्ञ में उपस्थित होने के लिये आह्वान करते हैं, इसलिये उन्हें 'होता' (हू+तृन्) नामक ऋत्विग्रूप कहा गया है।
यज्ञ-हवनादि कर्म से प्रसन्न होकर देवता मनुष्यों के अभिलषित को पूर्ण करते हैं। यज्ञ के अग्रणी अग्नि देवता भी यजमान के लिये विविध प्रकार के धन-धान्य को प्रदान करते हैं, इसलिये उन्हें 'रत्नधातम' कहा गया है।
ईडे (ईड स्तुतौ - लट्, उ.पु. ए. व.) का अर्थ है- स्तुति करता हूँ।