सारथी : भगवान श्रीकृष्ण की हमारे जीवन में भूमिका
भगवद्गीता भारतीय ज्ञान परंपरा का एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है, इसमें भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को माध्यम बनाकर संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए अध्यात्म ज्ञान का उपदेश दिया गया है।
जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ जाता है तब-तब श्रेष्ठ पुरुषों का इस धराधाम पर अभ्युदय होता है। जैसा कि निम्नलिखित श्लोक में कहा गया है—
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
(गीता 4.7)
जैसे कि महाभारत में हम देखते हैं कि तब भगवान कृष्ण ने द्रौपदी के मान-सम्मान की रक्षा की थी, जब दुर्योधन ने उसे अपमानित करने की कोशिश की थी।
यह सिद्ध करता है कि सज्जनों पर जब अत्याचार होते हैं तो ईश्वरीय शक्तियाँ उसकी रक्षा के लिए प्रकट हो जाती हैं।
भगवद्गीता आधुनिक जीवन प्रणाली से समन्वय को सिखाने वाला एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है, जिसमें ज्ञान योग, भक्ति योग, कर्म योग और मोक्ष के बारे में बताया गया है।
1. ज्ञान योग
यह आत्मा और परमात्मा के यथार्थ ज्ञान के बारे में है, यथा—
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥
(गीता 14.19)
2. भक्ति योग
यह भगवान के प्रति अनन्य प्रेम और भक्ति के बारे में है—
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥
(गीता 18.55)
3. कर्म योग
यह निष्काम कर्म के बारे में है, जिसमें फल की इच्छा न रखने की प्रेरणा प्रदान की गयी है—
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
(गीता 2.47)
4. मोक्ष
यह आत्मा की मुक्ति के लिये मार्गप्रशस्त करता है—
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
(गीता 4.24)
भगवद्गीता के ये चार योग हमें जीवन में सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं और हमें मोक्ष की प्राप्ति के लिए भी तैयार करते हैं।
अर्जुन की दुविधा का वर्णन करते हुए, हम कह सकते हैं कि वह अपने मोह और कर्तव्य बीच फस गया था। लेकिन भगवान कृष्ण ने उसे समझाया कि उसका कर्तव्य सबसे पहले है और उसे अपने कर्तव्य को पूरा करना चाहिए।
अर्जुन की कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि कैसे एक व्यक्ति को धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश के लिए कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं।
अर्जुन को अपने ही परिवार के सदस्यों के विरोध में लड़ना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने कर्तव्य को पूरा किया और अधर्म का नाश किया।
भगवान कृष्ण मुक्तात्मा हैं, उन्होंने स्वयं इस अद्भुत सत्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि—
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥
(गीता 3.22)
निष्कर्ष
श्रीकृष्ण के जीवन और उपदेश से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जीवन में कर्तव्य सबसे पहले है।
आत्मा अमर और अजर है एवं सद्म, रजस और तमस गुणों से ऊपर उठना (गुणातीत होना) और भगवान की उपस्थिति का अनुभव करना चाहिए।
भगवद्गीता एक ऐसा ग्रन्थ है जो हमें जीवन के सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।
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