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मानवता के शाश्वत आदर्श: वाल्मीकि के राम

Author: डॉ. निधि वेदरत्न

Issue: MAY JUNE 2026

मानवता के शाश्वत आदर्श: वाल्मीकि के राम

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण सम्पूर्ण विश्व में आदिकाव्य के रूप में विख्यात है। इस महान ग्रन्थ के मुख्यतः छह काण्ड माने जाते हैं—

• बालकाण्ड
• अयोध्याकाण्ड
• अरण्यकाण्ड
• किष्किन्धाकाण्ड
• सुंदरकाण्ड तथा
• युद्धकाण्ड।

उत्तरकाण्ड को अनेक विद्वानों द्वारा परवर्ती काल में जोड़ा गया माना जाता है, क्योंकि कथा वहीं समाप्त हो जाती है जहाँ भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक के साथ ही पूर्ण हो जाती है।

रामायण की यह गौरवशाली परम्परा अत्यन्त प्राचीन एवं दीर्घकालीन है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार इसकी काल-सीमा लगभग नौ लाख वर्षों के आसपास मानी जाती है।

एक कल्प = 14 मन्वन्तर
एक मन्वन्तर = 71 महायुग / चतुर्युगी
एक महायुग / चतुर्युगी = 4 युग
सतयुग – 17,28,000 वर्ष
त्रेतायुग – 12,96,000 वर्ष
द्वापरयुग – 8,64,000 वर्ष
कलियुग – 4,32,000 वर्ष

एक मानव चतुर्युगी का समय 43,20,000 वर्ष होते हैं।

इन युगों का विभाजन (4:3:2:1) के अनुपात से होता है।

① सतयुग – 17,28,000 वर्ष
② त्रेतायुग – 12,96,000 वर्ष
③ द्वापरयुग – 8,64,000 वर्ष
④ कलियुग – 4,32,000 वर्ष

वर्तमान समय में

वैवस्वत नाम वाला सातवाँ मन्वन्तर चल रहा है।

28वीं चतुर्युगी के कलियुग के अब तक 5127 वर्ष बीत चुके हैं।

कलियुग का 5128वाँ वर्ष चल रहा है।

यदि भगवान श्रीराम के अवतरण का समय —

• वैवस्वत मन्वन्तर के
• अठाईसवीं चतुर्युगी के
• त्रेतायुग के अन्तिम चरण में भी माना जाए,

तब भी वाल्मीकि की रामायण का कालखण्ड नौ लाख वर्षों से कम सिद्ध नहीं होता है।

त्रेतायुग — 30,875 वर्ष
द्वापरयुग — 8,64,000 वर्ष
कलियुग — 5,128 वर्ष
9,00,003 वर्ष

इस महाग्रन्थ का संरक्षण और प्रसार गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से हुआ है, जहाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसे श्रवण और कथन के रूप में जीवित रखा गया।

जिस रामवंश के सम्पूर्ण चरित्र को लव-कुश ने भगवान श्रीराम की सभा में कुछ घण्टों में सुनाया था, आज उसका कलेवर बढ़ जाने से वह कई दिन निरन्तर सुनाने वाली इतिहास गाथा बन गई है।

यद्यपि वाल्मीकीय रामायण को चतुर्विंशति साहस्री संहिता (अर्थात 24,000 श्लोकों का ग्रन्थ) कहा जाता है, तथापि वर्तमान में उपलब्ध संस्करणों में श्लोकों की संख्या इससे अधिक पाई जाती है।

इसका प्रमुख कारण यह है कि श्रुति-परम्परा के युग में विभिन्न आचार्यों एवं गुरुओं ने अपने-अपने विवेचन, कल्पना एवं व्याख्या के आधार पर कुछ नवीन श्लोक भी जोड़े।

परिणामस्वरूप, कुछ स्थानों पर मूल कथावस्तु से भिन्न या शास्त्रीय दृष्टि से असंगत अंश भी सम्मिलित हो गए, जिन्हें ‘प्रक्षिप्त’ (interpolated) श्लोक कहा जाता है।

क्रमशः।